Wednesday, July 2, 2008

ज़िंदगी है ये लाल रंग

लाल रंग मुझे बहुत पसंद है
इसलिए कि
सुबह की पहली किरण हो
या शाम की आखिरी किरण
उगते और डूबते
दोनों ही मौकों पर सूरज का रंग
लाल होता है
ये लाल रंग मुझे बहुत पसंद है
इसलिए कि जब धरती आहत होती है
और उसकी गर्भ से लावा आंसू बनकर निकलता है
तो उसका रंग भी लाल होता है
इसलिए कि
जब कोई तारा फूटता है
तो ब्राम्हांड में विलीन होने से पहले
उसका रंग भी लाल होता है
इसलिए कि
लाल लपटों में
समाने के बाद ही इंसानी
जिस्म से आत्मा मुक्त होती है
इसलिए कि
इंसानी चमड़ी
भूरी हो या काली
या फिर सफेद
इस चमड़ी के भीतर रगों में बहने
वाला लहू लाल है
ये लाल रंग मुझे बहुत पसंद है
इसलिए कि
चाहे ग़म हो या खुशी
ये रंग मेरे बेहद करीब है
किसी और रंग से कहीं ज्यादा
किसी और रंग से कहीं गहरे।

Tuesday, July 1, 2008

मौत की चिंता क्यों?

मृत्यु क्या है?
सांसों का रुकना
दिल का थमना
या फिर
दिमाग का शून्य होना
आखिर मृत्यु क्या है?
कभी कभी
ये सवाल जेहन में उठता है
अचानक बहुत अचानक
मस्तिष्क की दीवारों से टकरा कर
कौंधता है
तेज बहुत तेज
लगता है नसें फट जाएंगी
जिस्म सुन्न पड़ जाएगा
किसी भी वक़्त
कलेजा मुंह से बाहर आ जाएगा
सांस थम जाएगी
धड़कन बंद हो जाएगी
और मैं मर जाऊंगा
लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है
चंद पलों के भीतर
सबकुछ सामान्य हो जाता है
पहले की तरह शांत ...
फिर भीतर से
धीमी
दबी कुचली
निस्तेज
निस्प्राण
एक ही आवाज़ आती है
मृत्यु चेतना शून्य होना है
सच और गलत का भेद भूल कर
भौतिक सुखों में लिप्त होना है
और
तुम काफी पहले मर चुके हो
फिर तुम्हें मौत की चिंता क्यों?

मैं ज़िंदा रहना चाहता हूं

मैं ज़िंदा रहना चाहता हूं
हर सांस ज़िंदगी जीना चाहता हूं
जैसे धरती पर फसल लहलहाती है
जैसे सुबह की धूप खिलती है
जैसे आसमान पर बादल घुमड़ते हैं
जैसे ऊंचे पर्वत से नदी निकलती है
जैसे समंदर में सुनामी लहरें उठती हैं
जैसे हजारों मीटर नीचे टैक्टोनिक प्लेट टकराती हैं
जैसे लावा धरती को फाड़ कर आसमान में उठता
ठीक वैसे ही मैं ज़िंदा रहना चाहता हूं
बिना किसी रोकटोक
बिना किसी हील हुज्जत
बिना किसी द्वंद
प्रकृति की उन तमाम हलचलों की तरह
उन तमाम रचनाओं की तरह
मैं हर सांस ज़िंदगी जीना चाहता हूं
जिन पर इंसान का बस नहीं है